मेरी इ’पुस्तिका: My ebooks

Hello friends you can read my ebooks on Kindle. Hope you like. Please give reviews for my effort. Thank you.

पाठक मेरी इ पुस्तिका यहाँ पर पढ़ सकते हैं। नीचे दिए गये लिंक से आप उस तक पहुँच सकते हैं।

You can get it through link. Below..

धन्यवाद 🙏

ॐ नमः शिवाय

आप सभी साहित्य अनुरागियों को स्नेह वन्दन

🙏माँ वीणापाणी को सत् सत् नमन। माँ सभी पर कृपा बनाये रखें🙏

आज सावन के द्वितीय सोमवार पर लेखनालय पर प्रस्तुत है देवों के देव महादेव पर  छन्द परिवार के एक और छन्द पर आधारित चार पंक्तियाँ। इस छन्द में लय, भाव और नियमों को प्रधानता है। आशा करता हूँ आप सभी को ये कविता अवश्य पसन्द आएगी।

छवि श्रेय: साधक

शिव सबके हैं आत्म अधीश्वर, शिव सबके अंतरयामी,
ब्रह्मकोश शिव, शिव परात्पर, अष्टसिद्धि के शिव स्वामी।
आत्मज्ञान शिव, मुक्ति धाम शिव, शिव हैं सर्वश्रेष्ठ दाता,
एकमेव शिव, आदिदेव शिव, शिव ही केवल जग त्राता।।

-साधक

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पिछली कुछ कविताएँ:

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धन्यवाद🙏

जय माँ शारदे🙏

जय भोले

आप सभी साहित्य अनुरागियों को स्नेह वन्दन

🙏माँ वीणापाणी को सत् सत् नमन। माँ सभी पर कृपा बनाये रखें🙏

आज सावन के प्रथम सोमवार पर लेखनालय पर प्रस्तुत है देवों के देव महादेव पर  छन्दबद्ध चार पंक्तियाँ। इस छन्द में लय, भाव और नियमों को ही प्रधानता है। आप सभी को ज़्यादा छन्द में गुमराह न करते हुए मैं सीधे कविता पर आता हूँ और आशा करता हूँ आप सभी को ये कविता अवश्य पसन्द आएगी।

छवि श्रेय: साधक

शीश  गंग  राखते  गले भुजंग नाचते,
चंद्र माथ सोभता त्रिशूल हाथ साजते।
भस्म रंग  गौरि संग  आसने विराजते,
नंदि भृंगि कैलशे सभी शिवे उपासते।।

-साधक

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जय माँ शारदे🙏

जय हनुमंते नमः

आप सभी साहित्य अनुरागियों को स्नेह वन्दन

🙏माँ वीणापाणी को सत् सत् नमन। माँ सभी पर कृपा बनाये रखें🙏

आज लेखनालय पर प्रस्तुत है एक और कविता। जोकि एक छन्द आधारित कविता है। इस छन्द में लय, भाव और नियमों को ही प्रधानता है। आप सभी को ज़्यादा छन्द में गुमराह न करते हुए मैं सीधे कविता पर आता हूँ और आशा करता हूँ आप सभी को ये कविता अवश्य पसन्द आएगी।

छवि श्रेय: साधक

कहै पवनसुत करि कै विनती

कहै पवनसुत करि कै विनती,
धरौ   अशीष  भक्त  के  काँध।
मंज़िल   दूर   अभी   रघुराई,
कटि जइहिं पगि से कई साँझ।।

लै  जइहीं  हम  स्वामी  दौ के,
वायु   मार्ग  से   भ्रात  निवास।
भयौ चकित चित्त सुमित्रा नंद,
सुनि  के  हनुमत  ऐहि उवाच।।

कैसे  दौ  जन  जा  सकते  हैं,
काँध   बैठ   हो  के  आकाश।
बोले   महावीर   लै   सकुँ  मैं,
अनंत  अकार  एकहि  स्वास।।

दोऊ  बाहु   अंजनी   सुत  ने,
दिये   रघुवर   समक्ष   फैलाय।
देख अलौकिक माया प्रभु की,
राम लक्ष्मण  प्रफुल्ल   पुराय।।

बिठा   कांधे   दशरथ   दुलारे,
जपति नाम जय जय श्री राम।
उड़ चले  हनुमत  छोड़ भू कौ,
देन काज अतुलित अभिराम।।

नहीं कौ वीर तुम  सा जग मै,
कहते  मनोज्ञ   कृपा  निधान।
तुम ही हो अतुल्य भक्त  मेरे,
तुम  भी   मेरे   भ्रात  समान।।

– साधक

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जय माँ शारदे🙏

मइया मोरी

प्रिय साहित्य अनुरागियों सादर नमन🙏

🙏माँ वीणापाणी को सत् सत् नमन। माँ सभी पर कृपा बनाये रखें🙏

आज लेखनालय पर प्रस्तुत है एक और कविता। जोकि एक छन्द आधारित कविता है। इस छन्द में लय, भाव और नियमों को ही प्रधानता है। आप सभी को ज़्यादा छन्द में गुमराह न करते हुए मैं सीधे कविता पर आता हूँ और आशा करता हूँ आप सभी को ये कविता अवश्य पसन्द आएगी।

छवि श्रेय: इंटरनेट/साधक

मइया मोरी सकल निहारे

मइया मोरी सकल निहारे, गालों को थुथुलाये,
नयनों को कजरी से सोभे, बालों को सहलाये।
माथा टीके निज नयनों से, संकट हर लेने को,
ऐसे ही आशीष लुटाती, लालित कर देने को।।

साधक

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जय माँ शारदे🙏

काम नहीं करता!

प्रिय पाठकों सादर नमन🙏

आज लेखनालय पर प्रस्तुत है एक और कविता। इस कविता में केवल लय और भाव को ही प्रधानता दी गयी है। आशा करता हूँ आप सभी को ये कविता अवश्य पसन्द आएगी।

छवि श्रेय: इंटरनेट

लोग कहते हैं मैं काम नहीं करता

आज कल मैं आराम नहीं करता,
फिर भी लोग कहते हैं, मैं काम नहीं करता।

कौन सच्चा यहां, कौन बदनाम नहीं करता,
बदल गया ज़माना कोई सूर्य प्रणाम नहीं करता,
जो अपने में ही खो जाएं उसे हसरत नहीं किसी की,
जो औरों का हो जाये वो ऐश और आराम नहीं करता,

फिर भी लोग कहते हैं, मैं काम नहीं करता।

मैंने भीड़ को भीड़ कहना छोड़ दिया,
औरों के लिए ख़ुद ही से रिस्ता तोड़ लिया,
आता है सामने से धुँवा मैं रूख़ नहीं बदलता,
अब तो हवाओं से भी रिश्ता मैंने जोड़ लिया,
सुबह से शाम तक हूँ बहता, विराम नहीं करता,

फिर भी लोग कहते हैं, मैं काम नहीं करता।

तन सूख गया ऐसे जैसे पत-झड़ आया हो,
सिमटकर कूप हुआ पेट जैसे बरस से न खाया हो,
पैरों की निचली परत, तवे सी शख़्त हो पड़ी,
जैसे शहर-भर का भोज उसी पे पकाया हो,
मन ऐसे में भी कभी तनिक विश्राम नहीं करता,

फिर भी लोग कहते हैं, मैं काम नहीं करता।

घर का एक-एक सदस्य रूठ गया मुझसे,
उनके सपनों का मंदिर जैसे टूट गया मुझसे,
जगत करम में मैंने अपना सर्वस्व लुटा दिया,
किस्मत का हरेक घड़ा ऐसे ही फूट गया मुझसे,
जीवन चक्र है ये, मैं कैसे कर्म निष्काम नहीं करता,

फिर भी लोग कहते हैं, मैं काम नहीं करता।

-साधक

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धन्यवाद 🙏

राधे राधे 🙏

जन्मदिवस

प्रिय पाठकों सादर नमन🙏

आज लेखनालय पर प्रस्तुत है एक ऐसी कविता जो मैंने अपने पिताजी के ऊपर लिखी है। आज उनका जन्मदिन है और यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन है। मैं इस दिन का बहुत बेसब्री से इंतजार करता हूँ। अपने बारे में लिखना बहुत आसान है परंतु पिता के बारे में लिखना असंभव सा लगता है। सच कहूं तो शब्द नहीं मिलते। उनकी प्रतिष्ठा को कायम रखने हेतु अंतरिम भाव शब्द कम पड़ जाते हैं। उनके लिए शब्द चयन करना अपने शब्दकोष से ही परे हो जाता है और कविता हो या उपन्यास पिता के बारे में सब नगण्य है।

छवि श्रेय: साधक/इंटरनेट

क्या  लिखूं

क्या लिखूं मैं जनक तुम बारे।
तुम सम गिरधर वास हमारे।।

तुम ही हो जीवन के पोषक।
तुमही कणकण हित परितोषक।।

तुम ही जीवन धार हमारे।
तुम ही पालन हार हमारे।।

तुम ही कष्ट कलेश निवारक।
पग पग के विपतति उद्धारक।।

तुम ही तन तरुवर के दाता।
तुम ही हमरे जीवन गाथा।।

लिखूं अनंत असंख्य बड़ाई।
शब्द नहि जो करै भरपाई।।

तुमहि रखते अनगिनत किस्से।
अशीष मै सब आते हिस्से।।

मृदु अमृदु के मेल मिलापा।
मन बल प्रण से जीवन नापा।।

लिख नहि पाऊँ तुम्हरी गाथा।
थकि जाते हैं मोरे हाथा।।

मुख कहै अब और नहि भाई।
आज गए हैं शब्द उराई।।

साधक

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राधे राधे 🙏

बेवफ़ा

प्रिय पाठकों सादर नमन🙏

आज लेखनालय पर प्रस्तुत है विरह पर एक और कविता। इस कविता में केवल लय और भाव को ही प्रधानता दी गयी है। आशा करता हूँ आप सभी को ये कविता अवश्य पसन्द आएगी।

छवि श्रेय: इंटरनेट

बेवफ़ाओं से कभी कोई प्यार नहीं करता

जाओ ढूढों और बताओ उस को,
कि कोई इंतजार नहीं करता,
बेवफ़ाओं से कभी कोई प्यार नहीं करता।
वो थकता है, टुकड़ों में बंटता है,
फिर भी इकरार नहीं करता,
बेवफ़ाओं से कभी कोई प्यार नहीं करता।

समय के वृक्ष से तबस्सुम चुन लेता है,
ख़्वाबों की सहनाई से उधार धुन लेता है,
संयोग कर दोनों का गुज़ारता है ज़िन्दगी,
सफ़र के ऐसे ही लम्हों से संवारता है जिंदगी,
पर दिल-ए-मजरूह, ग़म उज़ार नहीं करता,
बेवफ़ाओं से कभी कोई प्यार नहीं करता।

उसके अश्कों में भी समंदर होता है,
जब होता है अकेला तब ही रोता है,
मुस्कान भी उसकी असल है लगती,
पलकें हैं झुकी होती आँखे हैं जगती,
फिर भी तर्क-ए-मोहब्बत में तुझे,
कभी बाज़ार नहीं करता,
बेवफ़ाओं से कभी कोई प्यार नहीं करता।

-साधक

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राधे राधे🙏

कुछ ख़्वाब समेटे होंगे

प्रिय पाठकों सादर नमन🙏

आज लेखनालय पर प्रस्तुत है विरह पर एक और कविता….

छवि श्रेय: इंटरनेट

‘कुछ ख़्वाब समेटे होंगे, कुछ ख़्वाब लुटाया होगा’

चाँदनी रात में तुमनें भी कुछ अश्क़ बहाया होगा,
कुछ ख़्वाब समेटे होंगे, कुछ ख़्वाब लुटाया होगा,
पुरानी आदतों को नई आदतों से रिझाया होगा,
ज़बरन निवाले को भूख तक पहुँचाया होगा,
नींद को दरवाज़े से खींच कर पास बुलाया होगा,
अंधेरों में फिर भी उसे, उज़ाला ही नज़र आया होगा,
हाँ जैसे हम ने लम्हें बिताए, तुमने भी बिताया होगा,
कुछ ख़्वाब समेटे होंगे, कुछ ख़्वाब लुटाया होगा।

नीले गगन में भी तुम ने काले समंदर देखे होंगे,
रूह को जो सहा न जाये ऐसे ही मंज़र देखे होंगे,
कुछ गिनती के कंकड़-ईंट हथेली से लगाए होंगे,
उन्हें दूर पहुँचाने के कई रास्ते बनाये, दिखाये होंगे,
उंगलियों से अजीबो-गरीब चित्रकारी की होगी,
हाँ ख़्वाबों में डूब कर यादों की सवारी की होगी,
फिर भी इन सब से मन बस में न आया होगा,
कुछ ख़्वाब समेटे होंगे, कुछ ख़्वाब लुटाया होगा।

चाहत कुछ ऐसी होगी कि दौड़ के पास चले जाएं,
कैसे गुज़रता है यह लम्हा कुछ उन्हें भी बतलाएं,
पर जिन कदमों से लौट आयें फिर कैसे जाना होगा,
बस इन्हीं सवालों से तन-मन टूट रहा तुम्हारा होगा,
हाँ बस ऐसे ही हम ने भी खुद को समझाया होगा,
कुछ ख़्वाब समेटे होंगे, कुछ ख़्वाब लुटाया होगा।

साधक

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राधे राधे🙏

क्या हुआ अगर रात थम जाएगी

छवि श्रेय: साधक

क्या हुआ….अगर रात थम जाएगी,
बस इतना कि सुबह उजालें का रोना गाएगी,
हम, तुम और ये ज़हाँ सो रहे होंगे,
कुछ अनसुने-अनचाहे ख़ाब बो रहे होंगे,
समंदर भी नीले से काला हो गया होगा,
दरिंदा-ए-वक़त-ए-निराला हो गया होगा,
कुछ मुस्कुराते चेहरे मुरझा गए होंगे,
कुछ उदासी से जंग जीत आ गए होंगे,
ग़र रज़ा हुई मुकम्मल तो वहीं गम भी जाएगी,
…..क्या हुआ… अगर रात थम जाएगी।

बस…
पशु-पंक्षियों को थोड़ा और सोना पड़ेगा,
और जगे हुये को जज़्बात भिगोना पड़ेगा,
पग-ए-रहगुज़र मद-मस्त हो जाएंगे,
रात्रि के जुगनू अस्त-व्यस्त हो जाएंगे,
निशा को भी जगे-जगे थकान आने लगेगा,
वो उजालें को तड़प के बुलाने लगेगा,
दरखतें भी भोजन को तिलमिलायेंगी,
वो हवाओं से सूरज को ख़त भिजवाएँगी,
न जाने किस की पहरेदारी में वो सो रहा होगा,
यहां जग अंधरे में विलीन वो ख़ाब बो रहा होगा,
तब कहीं जा के सुब्ह-ए-सबनम आएगी,
…क्या हुआ… अगर रात थम जाएगी।

-साधक

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धन्यवाद 🙏

छवि

ॐ हनुमंते नमः🙏

लेखनालय

छवि श्रेय: इंटरनेट/साधक

हनुमान जी के बारह नाम का स्मरण करने से ना सिर्फ उम्र में वृद्धि होती है बल्कि समस्त सांसारिक सुखों की प्राप्ति भी होती है। बारह नामों का निरंतर जप करने वाले व्यक्ति की श्री हनुमानजी महाराज दसों दिशाओं एवं आकाश-पाताल से रक्षा करते हैं। प्रस्तुत है केसरीनंदन बजरंग बली के 12 चमत्कारी और असरकारी नाम :

हनुमान जी के 12 असरकारी नाम
ॐ हनुमान
ॐ अंजनी सुत
ॐ वायु पुत्र
ॐ महाबल
ॐ रामेष्ठ
ॐ फाल्गुण सखा
ॐ पिंगाक्ष
ॐ अमित विक्रम
ॐ उदधिक्रमण
10 ॐ सीता शोक विनाशन
11 ॐ लक्ष्मण प्राण दाता
12 ॐ दशग्रीव दर्पहा

हनुमान मंत्र :

श्री हनुमंते नम:
अतुलित बलधामं, हेमशैलाभदेहं।
दनुजवनकृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुण निधानं, वानराणामधीशं।
रघुपतिप्रिय भक्तं, वातजातं नमामि।।

जय श्री राम 🙏

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